छतरपुर।
जिला अस्पताल… नाम सरकारी, इलाज सरकारी, लेकिन अगर सोनोग्राफी की जरूरत पड़ जाए तो मरीज को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए! कम से कम खजुवा गांव से आई गर्भवती आरती पटेल के परिवार का आरोप तो यही है।
राजनगर थाना क्षेत्र के खजुवा गांव निवासी 40 वर्षीय आरती पटेल, पति ताई पटेल, प्रसव पीड़ा और बिगड़ती तबीयत के बीच जिला अस्पताल पहुंचीं। परिजनों के मुताबिक, डॉक्टरों ने जांच के बाद सोनोग्राफी कराने की सलाह दी, लेकिन अस्पताल में सुविधा उपलब्ध नहीं होने की बात कहकर उन्हें बाहर निजी सेंटर जाने के लिए कहा गया।
अब सवाल सीधा है—अगर सरकारी अस्पताल में ही जरूरी जांच की सुविधा नहीं है, तो गंभीर हालत में पहुंचने वाली गर्भवती महिला आखिर जाए तो जाए कहां?
परिजनों के अनुसार आरती को जिला अस्पताल के बाहर स्थित एक निजी अल्ट्रासाउंड सेंटर ले जाया गया। करीब दोपहर 2 बजे सोनोग्राफी हुई, जहां परिजनों को कथित तौर पर पता चला कि गर्भ में पल रहे बच्चे की मौत हो चुकी है।
इसके बाद परिवार में चीख-पुकार मच गई।
परिजनों का आरोप है कि अगर समय पर जिला अस्पताल में ही सोनोग्राफी और आवश्यक उपचार मिल जाता, तो शायद स्थिति कुछ और होती। हालांकि, बच्चे की मौत का वास्तविक चिकित्सकीय कारण और इलाज में देरी की भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
लेकिन साहब, सवाल तो बनता है—
सरकारी अस्पताल में मशीन बंद है तो जिम्मेदारी किसकी है?
गंभीर गर्भवती महिला को बाहर भेजने का फैसला किसने लिया?
क्या जिला अस्पताल में वैकल्पिक व्यवस्था नहीं होनी चाहिए थी?
और अगर सरकारी अस्पताल गरीब मरीजों के लिए है, तो हर जरूरी जांच के लिए निजी सेंटर का दरवाजा क्यों खटखटाना पड़े?
एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने के दावे करती है, दूसरी तरफ अगर अस्पताल में जरूरी जांच सुविधा ही समय पर उपलब्ध न हो, तो इन दावों की हकीकत पर सवाल उठना लाजमी है।
फिलहाल परिवार ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच, जिम्मेदारी तय करने और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
अब देखना यह है कि अस्पताल प्रबंधन इस मामले में क्या जवाब देता है—मशीन बंद थी, व्यवस्था बंद थी या फिर जिम्मेदारी?












