Uliveindia की ग्राउंड रिपोर्ट में पीड़ितों का दावा—50 से 60 मौतें, 100 से 150 लोग अब भी अस्पतालों में भर्ती; मुआवजे और सरकारी नौकरी की मांग
सागर/बंडा। मध्यप्रदेश के सागर जिले के बंडा क्षेत्र में जहरीली शराब से हुई मौतों का मामला लगातार गंभीर होता जा रहा है। प्रशासन और मीडिया में सामने आए आंकड़ों के बीच अब बड़ा अंतर सामने आया है।
Uliveindia की टीम जब घटनास्थल पर पहुंची तो कई पीड़ित परिवारों और ग्रामीणों ने दावा किया कि जहरीली शराब पीने से मरने वालों की संख्या सरकारी तौर पर बताए जा रहे आंकड़ों से कहीं अधिक है।
ग्रामीणों और पीड़ित परिवारों के अनुसार, करीब 50 से 60 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 100 से 150 लोग अभी भी अस्पतालों में भर्ती बताए जा रहे हैं।
हालांकि, इन आंकड़ों की स्वतंत्र अथवा आधिकारिक पुष्टि Uliveindia नहीं करता है। मौतों और अस्पताल में भर्ती मरीजों की वास्तविक संख्या प्रशासनिक रिकॉर्ड से ही स्पष्ट हो सकेगी।’पूरी तरह स्वस्थ नहीं हुए, फिर भी घर भेज दिया’ग्राउंड रिपोर्ट के दौरान एक पीड़ित ने Uliveindia को बताया कि जहरीली शराब पीने के बाद उसकी तबीयत अभी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है। पीड़ित का आरोप है कि उसे पूरी तरह स्वस्थ हुए बिना ही अस्पताल से छुट्टी देकर घर भेज दिया गया।पीड़ित के मुताबिक उसकी आंखों की रोशनी भी प्रभावित हुई है और वह अभी सामान्य स्थिति में नहीं लौट पाया है। ऐसे आरोपों की चिकित्सकीय पुष्टि और अस्पताल रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।
‘न अधिकारी पहुंचे, न नेताओं ने सुध ली’पीड़ित परिवारों का कहना है कि इस त्रासदी के बाद उनके सामने सबसे बड़ा संकट परिवार चलाने और इलाज का है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि अब तक न तो कोई अधिकारी उनकी स्थिति जानने पहुंचा और न ही किसी नेता ने उनकी पर्याप्त मदद की।कई परिवारों का कहना है कि जहरीली शराब से जिन लोगों की मौत हुई, उनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी जो खेती, मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके परिवार का भरण-पोषण करते थे।
कमाने वाले सदस्य की मौत के बाद परिवारों के सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।’अंतिम संस्कार का खर्च भी परिवार उठा रहे’ग्रामीणों ने दावा किया कि जिन परिवारों में मौतें हुई हैं, वे अंतिम संस्कार और अन्य क्रियाकर्म का खर्च अपने स्तर पर उठा रहे हैं। पीड़ित परिवारों का कहना है कि उन्हें तत्काल आर्थिक सहायता, इलाज और परिवार के भविष्य के लिए ठोस सरकारी मदद की जरूरत है।ग्रामीण बोले—अगर शराब घर-घर पहुंचती तो तबाही और बड़ी होती ग्रामीणों ने प्रशासन से सवाल करते हुए कहा कि यदि जहरीली शराब बड़े पैमाने पर रक्षाबंधन के दौरान गांव-गांव और घर-घर पहुंच जाती, तो स्थिति और भयावह हो सकती थी। उनका कहना है कि समय रहते कार्रवाई नहीं होती तो हजारों लोगों की जान जाने की आशंका पैदा हो सकती थी।आज कई परिवारों के मासूम बच्चों के सिर से पिता का साया उठ चुका है।
कहीं भाई की मौत हुई है तो कहीं बेटा परिवार को छोड़कर चला गया। इस त्रासदी ने पूरे क्षेत्र में गहरा दर्द और आक्रोश पैदा कर दिया है।आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई और जमीन जब्त करने की मांगपीड़ित परिवारों और ग्रामीणों ने जहरीली शराब बेचने और इस नेटवर्क से जुड़े लोगों के खिलाफ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की मांग की है। कुछ ग्रामीणों ने आरोपियों को कठोरतम सजा देने की मांग करते हुए कहा कि दोषियों की संपत्ति और जमीन को जब्त कर उससे पीड़ित परिवारों की सहायता की जानी चाहिए।ग्रामीणों का कहना है कि सिर्फ गिरफ्तारी पर्याप्त नहीं है। इस पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल थे, शराब कहां बनी, किसने पहुंचाई और किन स्तरों पर लापरवाही हुई—इन सभी सवालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
OBC महासभा ने दी आंदोलन की चेतावनीमामले को लेकर OBC महासभा के राष्ट्रीय कोर कमेटी सदस्य महेंद्र सिंह लोधी, सागर संभागीय अध्यक्ष गया प्रसाद पटेल और राष्ट्रीय महासचिव राहुल मोदी ने भी पीड़ित परिवारों के समर्थन में आवाज उठाई।संगठन से जुड़े पदाधिकारियों ने प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा कि यदि समय रहते पीड़ित परिवारों को एक-एक करोड़ रुपये की आर्थिक सहायता और सरकारी नौकरी नहीं दी गई तो संगठन सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेगा।सबसे बड़ा सवाल—आखिर वास्तविक मौतों का आंकड़ा कितना?बंडा जहरीली शराब कांड में सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि वास्तव में कितने लोगों की मौत हुई और कितने लोग बीमार हुए?
एक तरफ प्रशासनिक और मीडिया रिपोर्टों में अलग-अलग संख्या सामने आ रही है, वहीं Uliveindia की ग्राउंड रिपोर्ट में ग्रामीण और पीड़ित परिवार इससे कहीं अधिक मौतों और अस्पताल में भर्ती मरीजों का दावा कर रहे हैं।ऐसे में प्रशासन के सामने अब जरूरी है कि मृतकों, अस्पतालों में भर्ती मरीजों, इलाज से छुट्टी पाए मरीजों और प्रभावित परिवारों का सत्यापित आंकड़ा सार्वजनिक किया जाए, ताकि इस त्रासदी की वास्तविक तस्वीर सामने आ सके।यह सिर्फ शराब से हुई मौतों का मामला नहीं है, बल्कि उन परिवारों के भविष्य का सवाल है जिन्होंने अपने कमाने वाले सदस्य खो दिए हैं। पीड़ित परिवारों की मांग है कि उन्हें तत्काल इलाज, आर्थिक सहायता, रोजगार और उनके परिवारों के भविष्य की सुरक्षा दी जाए।Uliveindia की ग्राउंड रिपोर्ट का सवाल साफ है—सरकारी आंकड़ों और जमीन पर पीड़ितों के दावों के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों है? और इन परिवारों तक वास्तविक सरकारी मदद आखिर कब पहुंचेगी?












