Home / धर्म / अखंड सौभाग्य का वरदान ! विश्व का सबसे प्राचीन मंदिर वाराणसी, जहां खुद विराजमान मां शैलपुत्री: यहां मां करती भक्तों की मुराद पूरी, वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानी भी हो जाती दूर**!!.भगवान शिव की नगरी में मां शैलपुत्री का प्राचीन मंदिर, दुनिया में ऐसा मंदिर और कहीं नहीं.!!

अखंड सौभाग्य का वरदान ! विश्व का सबसे प्राचीन मंदिर वाराणसी, जहां खुद विराजमान मां शैलपुत्री: यहां मां करती भक्तों की मुराद पूरी, वैवाहिक जीवन में आने वाली परेशानी भी हो जाती दूर**!!.भगवान शिव की नगरी में मां शैलपुत्री का प्राचीन मंदिर, दुनिया में ऐसा मंदिर और कहीं नहीं.!!

*छतरपुर✍️*नवरात्रि के प्रथम दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है, जो नवदुर्गाओं में प्रथम और पर्वतराज हिमालय की पुत्री हैं। इन्हें शक्ति, दृढ़ संकल्प, पवित्रता और स्थिरता की देवी माना जाता है। विश्व का सबसे प्राचीन मंदिर वाराणसी, जहां खुद विराजमान मां शैलपुत्री, उत्तर प्रदेश के धार्मिक स्थल वाराणसी में जहां खुद शिव शंकर विराजमान रहते हैं l वहां से आदि शक्ति कैसे दूर हो सकती है। शिव की नगरी काशी में इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिलता है। वाराणसी में एक ऐसा मंदिर है, जहा पर खुद मां शैलपुत्री विराजमान है l भक्तों को साक्षात दर्शन देती है। मां शैलपुत्री के मंदिर में आस्था का समन्दर उमड़ता है। मंदिर बेहद प्राचीन है और यह इतना पुराना मंदिर है कि यहां पर लोगों को इस बात की जानकारी नहीं है कि मंदिर को कब व किसने स्थापित किया। सेवादारों ने बताया कि राजा शैलराज के यहां पर माता शैलपुत्री का जन्म हुआ था उनके जन्म के समय नारद जी वहां पर पहुंचे थे और कहा था कि यह पुत्री बहुत गुणवान है और भगवान शिव के प्रति आस्था रखने वाली होगी। इसके बाद जब माता शैलपुत्री बड़ी हुई तो वह भ्रमण पर निकल गयी। मन में शिव के प्रति आस्था थी इसलिए वह उनकी नगरी काशी पहुंची। यहां पर वरुणा नदी के किनारे की जगह उन्हें बहुत अच्छी लगी। इसके बाद माता शैलपुत्री यही पर तप करने लगी। कुछ दिन बाद पिता भी यहां आये तो देखा कि उनकी पुत्री आसन लगाकर तप कर ही है इसके बाद राजा शैलराज भी वही पर आसन लगा कर पत करने लगे। बाद में पिता व पुत्री के मंदिर का निर्माण हुआ। मंदिर में नीचे पिता राजा शैलराज शिवलिंग के रुप में विराजामन है जबकि उसी गर्र्भगृह में माता शैलपुत्री उपर के स्थान में विराजमान है। उन्होंने बताया कि मा शैलपुत्री ने फिर से पार्वती के रुप में जन्म लिया था और फिर उनका महादेव से विवाह हुआ था।*देश में नहीं होगा ऐसा मंदिर……*सेवादार पंडित बच्चेलाल गोस्वामी जी महाराज का दावा है कि दुनिया में अन्य कही पर ऐसा मंदिर नहीं होगा। माता यहां पर खुद विराजमान है, जबकि अन्य कही पर माता के विराजमान होने की बात सामने नहीं आयी है। उन्होंने कहा कि बालावस्था में ही माता तप करने के लिए बैठ गयी थी, इसलिए अन्य कही जाने की संभावन नहीं हो सकती है। दोनों नवरात्र के पहले दिन माता शैलपुत्री माता पर्वती व दुर्गा के नौ रुप का दर्शन देती है।

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