राजकल्पना बस हादसा: आग लगी तो भी दौड़ती रही बस…!?
यात्रियों का आरोप—समय रहते बस रोक दी जाती तो बच सकती थीं कई जानें, RTO-पुलिस की कथित ‘सेटिंग’ पर भी उठे सवाल ..?
छतरपुर/राठ – ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर राजकल्पना ट्रैवल्स की डबल डेकर बस में लगी आग ने यात्री सुरक्षा और परिवहन व्यवस्था की पोल खोलने वाले गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हादसे में हमीरपुर जिले के तीन यात्रियों समेत नौ लोगों की मौत की जानकारी सामने आई है। मृतकों में ममना गांव की सरोज गुप्ता (55), राठ के सॉफ्टवेयर इंजीनियर मयंक गुप्ता (28) और मुस्करा की ऊषा देवी गुप्ता (65) शामिल हैं।
हादसे से बचकर निकले राठ निवासी सुनील कुमार सोनी ने चालक और परिचालक पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनके मुताबिक, बस में करीब 30 से 35 यात्री सवार थे। रात करीब 11:30 बजे यमुना एक्सप्रेसवे पर किलोमीटर 33 के पास चालक की केबिन के आसपास से जलने की बदबू आने लगी। यात्रियों ने चालक-परिचालक को इसकी सूचना दी, लेकिन आरोप है कि खतरे को गंभीरता से नहीं लिया गया।
इसके कुछ ही देर बाद चालक की सीट के पास आग की लपटें दिखाई देने लगीं। यात्रियों में चीख-पुकार मच गई और बस रोकने की मांग की गई। सुनील का आरोप है कि बस तत्काल नहीं रोकी गई और तेज गति से चलती रही। देखते ही देखते आग और धुआं पूरी बस में फैल गया। जान बचाने के लिए यात्रियों को खिड़कियों और दरवाजों से निकलने की जद्दोजहद करनी पड़ी।
सवाल सिर्फ हादसे का नहीं, जवाबदेही का भी है
इस दर्दनाक घटना के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर बस में आग लगने के संकेत पहले ही मिल गए थे, तो उसे तत्काल क्यों नहीं रोका गया? यात्रियों की शिकायत को गंभीरता से क्यों नहीं लिया गया? बस की फिटनेस, अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन निकास, परमिट और संचालन की निगरानी किस स्तर पर हुई थी?
इसी बीच सोशल मीडिया और स्थानीय स्तर पर RTO और पुलिस से कथित मिलीभगत/‘सेटिंग’ के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए जांच एजेंसियों के लिए यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बस वैध दस्तावेजों और निर्धारित सुरक्षा मानकों के तहत संचालित हो रही थी या नहीं।
सुनील कुमार सोनी ने गौतमबुद्धनगर के जेवर थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है। अब जांच में यह सामने आना बाकी है कि हादसा केवल तकनीकी खराबी का परिणाम था या चालक-परिचालक की कथित लापरवाही और सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने मौतों का रास्ता आसान किया।
नौ जिंदगियां चली गईं, कई परिवार उजड़ गए। अब जरूरत सिर्फ मुआवजे की नहीं, बल्कि उन सवालों के जवाब की है—बस सड़क पर उतरी कैसे, सुरक्षा जांच किसने की और आग लगने के बाद समय रहते यात्रियों की जान बचाने के लिए क्या कदम उठाए गए?












